
विवेक आसरी
पत्रकार, लेखक और कवि हैं, जो वर्तमान में जर्मनी में रहते
हैं. उन्होंने भारत के साथ-साथ जर्मनी और ऑस्ट्रेलिया में भी पत्रकारिता की है.
एक लेखक और कवि के तौर पर उनकी रचनाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में
प्रकाशित हुई हैं. उनका एक नाटक ‘इंसाफ एक सीधी रेखा है’ प्रकाशित हुआ है
जबकि नाटक ‘होली काउ का गोबर’ के लिए उन्हें 2009 में मोहन राकेश सम्मान
से नवाजा गया था और शीघ्र प्रकाश्य है. संपर्कः Vivekkumarasri@gmail.com
सर्दी का एक धुंधला दिन है। इंग्लैंड के उत्तर में स्थित छोटे-से कस्बे बिलिंगहैम
में सत्रह साल की लॉरेन अपने भारी बैग के साथ बस में चढ़ती है। वह स्कूल
नहीं, एक विचार की तलाश में है। बस उसे एक घंटे से ज़्यादा दूर डार्लिंगटन के
कॉलेज तक ले जाएगी, जहां वह फ्रेंच और स्पैनिश पढ़ती है, ऐसी भाषाएं जो
उसके स्कूल ने अब पढ़ाना बंद कर दिया है।
उसका स्कूल घर से पांच मिनट की दूरी पर है, लेकिन बीस मील के दायरे में
कोई भी संस्थान अब आधुनिक भाषाओं की पढ़ाई नहीं कराता। इसलिए वह रोज़
दो घंटे का सफ़र करती है, सिर्फ़ इसलिए कि एक ऐसी कक्षा में बैठ सके जहां
शब्द अब भी जीवित हैं। जहां फ्रेंच की क्रियाएं और स्पैनिश की वाक्य-रचना
अभी तक किसी मशीन ने निगल नहीं ली है।
लॉरेन की कहानी एक लड़की की नहीं, एक युग की कहानी है। ब्रिटेन के स्कूलों
में अब ऐसी कक्षाएं “भाषाई रेगिस्तान” बनती जा रही हैं, जहां कभी फ्रेंच, जर्मन
और स्पैनिश की नदियां बहती थीं। वहां अब सन्नाटा है। ब्रिटेन के शिक्षा विभाग
के नए आंकड़े बताते हैं कि हर तीन में से एक स्कूल में किसी भी प्रमुख
यूरोपीय भाषा का एक भी छात्र नहीं है। वेस्ट मिडलैंड्स में यह आंकड़ा लगभग
आधा है। 2004 में जब भाषाएं अनिवार्य विषय नहीं रहीं, तब से फ्रेंच पढ़ने वालों
की संख्या 3.18 लाख से घटकर 1.35 लाख रह गई। भाषा शिक्षकों की भर्ती भी
सरकार के लक्ष्य का केवल 43 प्रतिशत रह गई है। और अब, ब्रिटेन में शारीरिक
शिक्षा विषय के छात्र, फ्रेंच, जर्मन और लैटिन के कुल छात्रों से ज़्यादा हैं।
रेगिस्तान तभी फैलता है जब कुएं सूख जाएं। जब ज़रूरत की मिट्टी भोथरी हो
जाए, और पानी की जगह उपेक्षा रह जाए। लेकिन हर रेगिस्तान के नीचे एक
पुरानी नदी बहती रहती है, जो याद दिलाती है कि कभी यहां शब्दों की नमी थी।
यह सिर्फ़ ब्रिटेन की कहानी नहीं। अमेरिका में भी 2013 से 2016 के बीच
कॉलेजों में विदेशी भाषाएं पढ़ने वाले छात्रों की संख्या 16 प्रतिशत घट गई।
जापान में इंग्लिश मेजर करने वाले छात्रों की संख्या दो दशकों में आधी रह गई
है। भारत में संस्कृत शहरी स्कूलों से ग़ायब हो ही चुकी है औऱ उसकी जगह
कोडिंग और कॉमर्स ने ले ली है। दिल्ली के निजी स्कूलों में कभी प्रतिष्ठित रही
जर्मन अब ठहराव में है।
कारण बहुत तर्कसंगत है। अगर अंग्रेज़ी वैश्विक बाज़ार की भाषा है, कोडिंग
रोज़गार देती है और अनुवाद करने वाले तेज़ ऐप्स हर रुकावट मिटा देते हैं, तो
कोई क्यों व्याकरण में सिर खपाए? परिवारों के लिए यह निर्णय व्यावहारिक है।
लेकिन जब यही व्यावहारिकता सामूहिक रूप से दोहराई जाती है, तो नतीजा एक
ऐसी दुनिया होती है जहां शब्द अब बोझ लगने लगते हैं।
ब्रिटिश काउंसिल ने चेतावनी दी है कि भाषाएं सीखने में गिरावट “गंभीर राष्ट्रीय
संकट” बन चुकी है। 2025 की एक रिपोर्ट बताती है कि 2024 में ब्रिटेन के
सिर्फ़ 2.97 प्रतिशत ए-लेवल किसी भी भाषा में थे उनमें भी ज्यादातर वेल्श या
आयरिश थी। रिपोर्ट कहती है, “हम एक सांस्कृतिक पतन के कगार पर हैं,
जिसका असर कूटनीति, वाणिज्य और सामूहिक पहचान पर पड़ेगा।”
ऐसी ही स्थिति कई देशों में है। लागोस से लीमा, कोलकाता से कैलिफ़ोर्निया तक
भाषाओं की नमी सूखती जा रही है।
लेकिन है, और बहुत वाजिब है कि इससे क्या फर्क पड़ता है कि अब कम बच्चे
फ्रेंच या संस्कृत सीखते हैं? अब जबकि ऐसी चिप की बात हो रही है, जो आपके
शरीर में फिट हो तो आप किसी भी भाषा में सुनें, बात आपको अपनी भाषा में
सुनाई देगी। फोन के जरिए ऑडियो ट्रांसलेशन तो हो ही रहा है। फर्क इसलिए
पड़ता है क्योंकि भाषा सिर्फ़ संवाद का औज़ार नहीं, विचार की पारिस्थितिकी भी
हैं।
दार्शनिक *लुडविग विट्गेंस्टाइन ने कहा था, “मेरी भाषा की सीमाएं ही मेरे संसार
की सीमाएं हैं।”
अमेरिकी भाषाविद एडवर्ड सपीर ने 1929 में लिखा, “हम जिस ‘वास्तविक
दुनिया’ में रहते हैं, वह हमारी भाषा की आदतों से ही बनी है।”
उनके शिष्य बेंजामिन व्हॉर्फ़ ने जोड़ा, “हम प्रकृति को उन्हीं रेखाओं में बांटते हैं,
जो हमारी मातृभाषाएं खींचती हैं।”
हर भाषा दुनिया को देखने का एक नया तरीका देती है। फ्रेंच के लिंग, हिंदी के
आदरसूचक शब्द, योरूबा की कहावतें – हर एक अलग दिशा से दुनिया को काटती
हैं, एक नया आकाश बनाती हैं।
केन्याई लेखक नगुगी वा थ्योंगो कहते हैं, “गोली शरीर को गुलाम बनाती है,
लेकिन भाषा आत्मा को।” भाषा को छोड़ना सिर्फ़ संवाद खोना नहीं, स्मृति को
खोना है।
जब कक्षाएं खामोश होती हैं, तब केवल शब्द नहीं मरते, दुनियाएं मिटती हैं।
लेकिन जैसे-जैसे ये दुनियाएं सूखती हैं, नए झरने भी फूट रहे हैं। 2023 में
दुनिया की सबसे बड़ी सोशल मीडिया कंपनी मेटा ने सीमलेसएम4टी नामक ऐसा
मॉडल जारी किया जो सौ भाषाओं में आवाज़ से आवाज़, टेक्स्ट से आवाज़ और
आवाज़ से टेक्स्ट का अनुवाद कर सकता है। अब मैड्रिड में खड़ी एक पर्यटक
अपने फ़ोन में अंग्रेज़ी बोलती है और उसी क्षण स्पैनिश में उत्तर सुनती है।
जर्मनी की कंपनी डीपएल अब कई भाषाओं में गूगल से अधिक सटीक मानी
जाती है। गूगल का दायरा बड़ा है। वह अफ़्रीका और एशिया की भाषाओं को भी
कवर करता है। शोध बताते हैं कि ये टूल रोज़मर्रा के संवाद के लिए अब
लगभग “मानव समान” स्तर की सटीकता दे रहे हैं।
इसी बीच, स्टैनफर्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने एक ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस
(बीसीआई) विकसित किया जिससे एक लकवाग्रस्त महिला अपने मस्तिष्क
संकेतों को वाक्यों में बदल पाई, 62 शब्द प्रति मिनट की गति से।
टेक्सस विश्वविद्यालय में वैज्ञानिकों ने एमआरआई से लगातार भाषा पुनर्निर्मित
करने में सफलता पाई, बिना किसी सर्जरी के।
दिशा स्पष्ट है। पहले अनुवाद ने दीवारें गिराईं, अब न्यूरल इंटरफेस उनके नीचे
सुरंगें बना रहे हैं। और जैसे-जैसे यह होता है, शब्दों को याद रखने की ज़रूरत
कम लगने लगती है।
क्या यह भाषा के अंत की शुरुआत है? शायद नहीं। भाषा नहीं मरती, बस अपना
रूप बदलती है। भविष्य में भाषाएं उन पौधों की तरह होंगी जो ज़बरदस्ती नहीं,
प्रेम से खिलते हैं।
लोग अब भाषा सीखेंगे, ज़रूरत से नहीं, अपनत्व से। कोई कविता के लिए, कोई
दादी से बिना मशीन के बात करने के लिए, कोई प्रेम-पत्र लिखने की जिद में।
भाषाएं खेत नहीं रहेंगी, बगीचे बनेंगी, जहां शब्द उपयोगिता से नहीं, जज़्बे से
उगेंगे।
भारत की “हिंग्लिश” या अमेरिका की “स्पैंग्लिश” पहले ही रोज़मर्रा की ज़बान
बन चुकी हैं। आने वाले समय में यह मिश्रण और तेज़ होगा। एक किशोर
लागोस में योरूबा, अंग्रेज़ी और इमोजी तीनों में वाक्य बनाएगा और मशीनें
सुनिश्चित करेंगी कि सभी उसे समझ लें। शुद्धता घटेगी, मिश्रण पनपेगा।
न्यूरल तकनीक शब्दों को मिटाएगी नहीं, उन्हें फैलाएगी। भविष्य में “आई मिस
यू” कहना शायद पर्याप्त नहीं होगा। लोग याद के साथ उसकी गंध, स्वाद, और
ध्वनि भी भेज सकेंगे। भाषा तब अनुभव बन जाएगी, महसूस करने की
तकनीक।
लेकिन इस नए परिदृश्य में सबसे बड़ा खतरा असमानता का है। ब्रिटेन में निजी
स्कूलों में भाषाएं अब भी पढ़ाई जाती हैं, जबकि सरकारी स्कूलों में वे लगभग
विलुप्त हैं। भारत में अमीर परिवारों के बच्चे अब भी फ्रेंच या मैंडरिन सीख
सकते हैं, लेकिन गांवों में हिंदी की वैकल्पिक कक्षाएं तक बंद हो रही हैं।
अमेरिका में लैटिन सिर्फ़ अमीर स्कूलों में ज़िंदा है।
भाषा फिर से विशेषाधिकार बन रही है, जैसे कभी लैटिन हुआ करती थी – ज्ञान
का, सत्ता का, प्रतिष्ठा का प्रतीक।
ब्रिटिश काउंसिल के सर्वे बताते हैं कि अमीर इलाक़ों में भाषा विषय चुनने वाले
छात्रों की संख्या ग़रीब इलाक़ों से बीस प्रतिशत ज़्यादा है। यही पैटर्न अब
अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और दक्षिण एशिया में भी दिख रहा है, जहां ग्लोबल
भाषाएं अब इलिटिज्म का प्रतीक हैं। भविष्य शब्दों के अभाव का नहीं, उनकी
असमान उपलब्धता का होगा।
भाषाओं के पक्षधर यह भी कहते हैं कि दो भाषाएं जानने से दिमाग़ तेज़ होता
है। कनाडा की मनोवैज्ञानिक एलेन बायलिस्टॉक के अध्ययन बताते हैं कि
द्विभाषिकता ध्यान केंद्रित करने की क्षमता बढ़ाती है और बुज़ुर्गों में डिमेंशिया
को देर से आने देती है।
हालांकि 2018 में साइकोलॉजिकल बुलेटिन में छपी एक बड़ी समीक्षा ने पाया
कि “बाइलिंगुअल एडवांटेज” सीमित है और सभी संदर्भों में समान नहीं हैं।
लेकिन असली तर्क भावनात्मक और सांस्कृतिक हैं।
भाषाविद अनेटा पावलेंको ने दिखाया कि द्विभाषी लोग अलग-अलग भाषाओं में
अलग व्यक्तित्व महसूस करते हैं। मसलन, स्पैनिश में अधिक आत्मीय, अंग्रेज़ी
में अधिक औपचारिक। यानी भाषा सिर्फ़ अर्थ नहीं, पहचान की भी वाहक होती
है।
सॉफ़्टवेयर “आई लव यू” का अनुवाद तो कर सकता है, लेकिन किसी के “मुझे
तुमसे मोहब्बत” कहने की नर्मी नहीं पहुंचा सकता।
2045 की कल्पना कीजिए। बर्मिंगम में एक डॉक्टर पंजाबी बोलता है और मरीज़
के चश्मे अपने-आप उसे अंग्रेज़ी में अनुवाद कर देते हैं, सम्मान सहित। दिल्ली
में एक छात्रा बॉदलेयर की कविता पढ़ रही है; उसके सहपाठी वही कविता ऐप से
हिंदी में पढ़ रहे हैं, और दो छात्र बहस कर रहे हैं कि फ्रेंच मूल में जो अस्पष्टता
है, वह अनुवाद में बची या नहीं। लागोस में दादी योरूबा में कहानी सुनाती हैं,
और उनका पोता जर्मनी में बैठा उसी लय में सुन रहा है, ऐप अब अनुवाद के
साथ आवाज़ की आत्मा भी पहुंचा देता है।
टोक्यो में लकवाग्रस्त महिला अपने मस्तिष्क से सीधे अपनी बेटी से बात करती
है और आवाज़ उसकी अपनी है।
और किसी शांत कोने में, दो किशोर कोई वाक्य नहीं बोलते, बस साझा करते हैं
एक स्मृति: आम का स्वाद, मिट्टी की गंध, किसी की कमी की टीस। यह भाषा
का अंत नहीं, उसका रूपांतरण है।
ब्रिटेन की खाली फ्रेंच कक्षाएं हमें चेताती हैं कि यह मृत्यु नहीं, परिवर्तन का युग
है। शब्द दीवार नहीं, अब पुल हैं; उपकरण नहीं, अब कला हैं; ज़रूरत नहीं, अब
आत्मीयता हैं।
विट्गेंस्टाइन की चेतावनी आज भी सही है, “मेरी भाषा की सीमाएं ही मेरे संसार
की सीमाएं हैं।” लेकिन शायद अब “भाषा” की परिभाषा ही बदल रही है। अब
इसमें फ्रेंच और हिंदी के साथ इमोजी, कोड-मिश्रित वाक्य, और जल्द ही दिमाग़
से निकली छवियां भी होंगी।
भाषाएं नदियों जैसी हैं। कुछ सूख जाती हैं, कुछ नया रास्ता बना लेती हैं। हर
रेगिस्तान में किसी पुरानी नदी की याद बहती रहती है। सवाल यह नहीं कि
भाषाएं समाप्त होंगी या नहीं। वे नहीं होंगी। सवाल यह है कि कौन उन्हें ज़िंदा
रखेगा, और क्यों?
शायद सुंदरता के लिए।
शायद अपनत्व के लिए।
शायद याद और प्रेम के लिए।
लॉरेन की रोज़ की बस यात्रा हमें यह याद दिलाती है कि दुनिया को अब भी
शब्दों की ज़रूरत है, भले ही वे अब वैकल्पिक क्यों न हो गए हों।